कॉफी विद सखी की एक बेहतरीन शुरूआत हो रही है। आइडिया यह है कि हम दो सखियां कभी भी चैट पर एक साथ बैठेंगी, अपनी अपनी टेबल पर गर्मागर्म कॉफी होगी और चैट पर ऐसी बातें जिससे एक सखी दूसरी सखी के बारे में अच्छी तरह जान सके। मैं यह सिलसिला शुरू कर रही हूं अनीताजी के साथ। आप उन्हें जानती हैं, मुझे लगता था कि मैं भी जानती हूं, लेकिन बात करने से लगा कि अभी उन्हें बहुत जानना बाकी है। कुछ इसी अंदाज में बातचीत का जो रूप सामने आया वह पेश कर रही हूं... उम्मीद है सखियां इस कड़ी को आगे बढ़ाएंगी। एक दूसरे से इंटरव्यू के अंदाज में बात करेंगी और यहां हम एक एक कर सभी सखियों की खूबियों को दिलकश अंदाज में जान पाएंगे।
इस सिलसिले की शुरूआत अनीताजी से करने का ख्याल उनकी हाल में प्रकाशित हुई पुस्तक से आया है... आप भी जानिए कैसी हैं हमारी अनीता जी..
प्रवीणा: नमस्कार अनीता जी
अनीताजी: नमस्कार
प्रवीणा: अनीता जी , सबसे पहले आपको आपकी पहली पुस्तक ‘अन्तर्मन के स्पंदन’ के प्रकाशित होने पर बधाई।
अनीताजी: धन्यवाद प्रवीणा।
प्रवीणा: अनीता जी आपका लेखन की और झुकाव कब शुरू हुआ ? मै जानना चहुंगी
अनीताजी: सही से तो नहीं कहा जा सकता कि कब लेखन शुरू किया ... हाँ जब भी कोई विचार आता था मन में और समय होता था तो उसे पन्ने पर अंकित कर लेती थी ... जाने कितने ऐसे पन्ने होंगे ... बीच में लेखन बिलकुल बंद ही हो गया था ... बेटे के बाहर जाने के बाद समय भी था ज्यादा और कुछ दोस्तों ने उत्साहित किया तो फिर से कलम थाम ली
प्रवीणा: वाह । बहुत खूब, अनीता जी, आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी मानी जाती है ॥ , संगीत,खेल कूद , शिक्षा हर क्षेत्र मे आपका कॉलेज टाईम तक दाखल रहा है ...इसके पीछे कोई प्रेरणा स्रोत ?
अनीताजी: ऐसा तो कुछ ख़ास नहीं कहा जा सकता .. नृत्य के लिये तो माँ को श्रेय दूंगी ...गायन वादन में भी उन्ही के कारण कुछ कर पाई ... जो काम वो नहीं कर पायीं ...वो अपने बच्चों में देखना चाहती थी शायद .... और ये तो हम सभी में होता है ..हम जो खुद नहीं कर पाते, वो बच्चों के द्वारा पूरा होते देखना चाहते हैं ... खेल- कूद में बड़े भाई या यूँ कहें कि खुद भी रूचि थी . कुछ ऐसा हुआ कि कुछ कदम मैंने बढ़ाये और कुछ वक्त ने भी साथ दिया ... बस बात बनती चली गयी ... घर से भी रोक - टोक नहीं हुई ... टेबल - टेनिस के सिलसिले में बाहर भी जा कर खेलने के अवसर मिले ... जो अब मेरी यादों का हिस्सा हैं .. कुछ चीज़ें ईश्वर आपको स्वयं देता है ... वाद्य - यंत्रो के प्रति लगाव शायद इसी की देन है ... मैंने जो भी यंत्र में रूचि ली मेरे पिता न वह यंत्र मुझे दिला दिया .... मसलन गिटार , सितार , तबला , हारमोनियम और वायलिन .... मेरे पिता स्वयं अच्छा बैंजो बजाते थे ... विवाह के बाद जब यहाँ इलाहबाद आयी तो पाया की यहाँ तो सब लोग बहुत अच्छा बजाते हैं .. मेरी तरह थोडा- थोडा नहीं .... परिपक्वता के साथ ...मैं तो उनके आगे बिलकुल बच्चा थी .... मेरे पति ने भी संगीत विशारद किया है .... मैं तो कुछ भी नहीं ...
प्रवीणा: सुना है नदी के दो किनारे कभी नहीं मिलते उसकी कामना भी नहीं मुझे और मैंने कभी मिलना चाहा भी नहीं शायद... अनीता जी ये आपकी पुस्तक की वो पंक्तियां हैं जो नारी मन के एकाकी पन को दर्शाती है। उसकी कामनाएं इच्छाएं, इन सबको बहुत बारीकी से आपने उकेरा है अपनी कविता मे, क्या इसके पीछे कोई व्यक्तिगत अनुभव ... अगर बताना चाहे तो ?
अनीताजी: मुझे लगता है की ये एकाकीपन से ज्यादा उस मन: स्थिति को दिखाता है जहाँ एक महिला स्वयं को समाज के निश्चित किये नियमो मैं ढल लेती है ... किन्तु उस व्यक्ति को भूल नहीं पाती जो शायद उसका प्रथम प्रेम है।
प्रवीणा: सही कहा आपने।
अनीताजी: ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव नहीं . मेरी अधिकतर रचनायें दूसरों के अनुभवों पर आधारित हैं।
प्रवीणा: आप ब्लॉग भी लिखती है ?
अनीताजी: मेरी एक मित्र है ...ये उसका अनुभव है ...वो आज अपने घर परिवार मैं खुश है पर अपने प्रथम प्रेम को अज भी संजो के रखे हुए है ..यादों के रूप में।
प्रवीणा: जी
अनीताजी: अब रही बात ब्लॉग्गिंग की
प्रवीणा: उसका लिंक हमे भी दे ताकि हम पाठको को आपकी रचनाओ से अवगत करा सके
अनीताजी: मैंने अभी कुछ ही दिन पहले ब्लॉग की दुनिया में कदम रखा है ... अभी तो सब कुछ सीख रही हूँ .... हाँ आप ज़रूर आयें उस ब्लॉग पर . मुझे ख़ुशी होगी .........
प्रवीणा: शुक्रिया अनीता जी
अनीताजी: धन्यवाद आपको भी प्रवीणा जी
प्रवीणा: क्या आप समाजसेवा के किसी क्षेत्र से भी जुड़ी है ?
अनीताजी: नहीं ... अकेले तो कुछ नहीं करती लेकिन हाँ ऐसी संस्था से अवश्य जुडी हूँ जो सेवा कार्य करते हैं ..उसी के माध्यम से अच्छे कार्य हो जाते हैं ... एक अकेला व्यक्ति इतना नहीं कर पता है पर यदि आप किसी संस्था से जुड़ जाते हैं को ये कार्य सामूहिक रूप में किये जाये तो संपन्न हो जाते हैं ..जैसे कि किसी का ऑपरेशन करना हो ...किसी हॉस्पिटल में व्हील चेय़र देना या गरीब बच्चों के पढाई की व्यवस्था , या किसी अनाथालय में पूरे साल का खाना ... इस तरह के कई कार्य हैं जो हम करते हैं ... जिस दिन मेरी पुस्तक का विमोचन हुआ था, उस दिन पुस्तक से हुई संपूर्ण धन राशि मैंने संस्था को डोनेट की थी ... ये सिर्फ अंश मात्र ही होता है उन प्रोजेक्ट्स का जो हम करते हैं ...लेकिन कुछ भी डोनेशन हो वो काम में तो आता ही है
प्रवीणा: बहुत बढ़िया अनीता जी, आप सचमुच बहुमुखी प्रतिभा और प्रेरणा स्त्रोत है सबके लिए। हम सब की शुभकामनाएं आपके उज्ज्वल भविषय के लिए
अनीताजी: मुझे ऐसा नहीं लगता ... इस दुनिया मे बहुत से लोग हैं जो बहुत कुछ करते हैं
प्रवीणा: ये आपका बडप्पन है।
अनीताजी: फिर भी यही कहूँगी की जिससे जो हो जाये , ज़रूर करना चाहिए।
प्रवीणा: उम्मीद है भविषय मे भी आपके विभिन्न आयाम देखने को मिलते रहेंगे। बहुत शुभकामनाएं।
अनीताजी: कोशिश करुँगी की ऐसा हो .... आपको बहुत बहुत धन्यवाद , आपके समय के लिये
प्रवीणा: कॉफी विथ सखी मे ये थी हमारे साथ अनीता अग्रवाल जी। जिनके विचार बिन्दु से हम सभी लाभान्वित हुए उम्मीद है हम सब को उनका साथ ऐसे ही मिलता रहेगा।
No comments:
Post a Comment